Thursday, October 29, 2009

योद्धा का विषाद

जो व्यर्थ लाद कर घूम रही धर दूँ सारा बोझा उतार !

ये गीता और महाभारत सुन लेंगे थोड़ी देर बाद
यह महासमर की भूमि जान ले योद्धा के मन का विषाद !
मानव के संबंधों के सहज,विकृत कैसे अनगिन स्वरूप ,
जीवन के कितने रंग ,वृत्तियाँ दोष और गुण समाहार !

नारी के लिये जहाँ संभव ही नहीं कि मानव रहे सहज
केवल वर्जना ,और एकाँगी आदर्शों का भार दुसह !
कुठ दूर अकेले चलें कि ,अपने निर्णय के पल और टलें
चाहों की अँतिम खेप मित्र, इस तट पर ही जाऊँ उतार !

कुछ पीछे मुड़ कर लूँ निहार कैसे थे वे रिश्ते नाते !
सब धूल झाड़ कर साफ़ स्वच्छ पहले सँवार लूँ दर्पण में !
इन मोड़ों पर तो ओट सभी आँखों से होता वैसे भी
यादों की लाठी टेक जाँच लें किये-धरे को एक बार !

कुछ मीत और कोई अपने ,रह गये आज केवल सपने
जो दूर गये दर्शन कर लूँ नयनों में उनकी छवियाँ भर !
कुछ पछतावे कुछ क्षमा-दान जो शेष रहे पूरे कर लूँ ,
फिर सहज प्रसन्न मुक्त मन से नाविक से कह दूँ चलो पार !!

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