Thursday, October 29, 2009

अश्रु-सरिता के किनारे

अश्रु-सरिता के किनारे एक ऐसा फूल है ,
जो कभी कुम्हलाता नहीं है !
दूर उन सुनसान जीवन -घाटियों के
बीच की अनजान सी गहराइयों में ,
कहीं पत्थर भरे ऊँये पर्वतों के बीच में ,
नैराश्य के तम से भरी तनहाइयों में ,

गन्ध-व्याकुल हो पवन-झोंके जिसे छू ,
झूमते-से जब कभी इस ओर आते ,
कोकिला सी कूक उठती है हृदय की हूक ,
जीवन की पडी वीरान सी अमराइयों में !
उस अरूप ,अशब्द अद्भुत गंध का संधान पाने
अनवरत ऋतुयें भटकतीं ,
कूल मिल पाता नहीं है !
*
हर निमिष चलता कि जिसको खोजने ,
पर लौट कर वापस कभी आने न पाता ,
है बहुत सुनसान दुर्गम राह जिसकी ,
काल का अनिवार कर दुलरा न पाता ,
बिखर जाते बिम्ब मानस की लहर में ,
रूप ओझल भी न होता ,व्यक्त भी होने न पाता ,
चाँद -सूरज ,झाँक पाने में रहे असफल सदा ही ,
विश्व की चह वायु छू पाती नहीं ,
इस मृत्तिका की गोद मे वह टूट झर जाता नहीं है १
*
एक दिन जिस बीज को बोया गया था
कहीं दुनिया की नजर से दूर अंतर के विजन में ,
चिर-विरह के पंक मे अंकुर जगे ,
चुपचाप ही रह कर न जाने कौन क्षण में ,
चिर- कुमारी साध ने अपनी उमंगों को गलाकर रँग भरे थे ,
अब वही सौरभ कसक भरता मधुर
इस सृष्टि के परमाणुओं के हर मिलन मे ,
वे अमाप,अगम्य,घन गहराइयों रखतीं सँजो कर ,
और उसके लिये सच है ये ,
समय की लहर से उसका कभी भी रंग धुल पाता नहीं है !

योद्धा का विषाद

जो व्यर्थ लाद कर घूम रही धर दूँ सारा बोझा उतार !

ये गीता और महाभारत सुन लेंगे थोड़ी देर बाद
यह महासमर की भूमि जान ले योद्धा के मन का विषाद !
मानव के संबंधों के सहज,विकृत कैसे अनगिन स्वरूप ,
जीवन के कितने रंग ,वृत्तियाँ दोष और गुण समाहार !

नारी के लिये जहाँ संभव ही नहीं कि मानव रहे सहज
केवल वर्जना ,और एकाँगी आदर्शों का भार दुसह !
कुठ दूर अकेले चलें कि ,अपने निर्णय के पल और टलें
चाहों की अँतिम खेप मित्र, इस तट पर ही जाऊँ उतार !

कुछ पीछे मुड़ कर लूँ निहार कैसे थे वे रिश्ते नाते !
सब धूल झाड़ कर साफ़ स्वच्छ पहले सँवार लूँ दर्पण में !
इन मोड़ों पर तो ओट सभी आँखों से होता वैसे भी
यादों की लाठी टेक जाँच लें किये-धरे को एक बार !

कुछ मीत और कोई अपने ,रह गये आज केवल सपने
जो दूर गये दर्शन कर लूँ नयनों में उनकी छवियाँ भर !
कुछ पछतावे कुछ क्षमा-दान जो शेष रहे पूरे कर लूँ ,
फिर सहज प्रसन्न मुक्त मन से नाविक से कह दूँ चलो पार !!

Wednesday, October 28, 2009

पारदर्शी

­शब्द मत सानो ,
मनोरोगों में दूषण में,
दुबके विकारों से अर्थ-जाल पूरो क्यों!
जमा हुआ मैल साबुन पानी से धुलता है,
शब्दों को कुंठा- कणों में डुबाना क्यों ?
चाहे नहाया ना हो
क्रीम लगा ,
सेन्ट छिडक ,शोभन बन दर्पण के सामने
अपना ही रूप मुस्कान बन जायेगा !
उज्ज्वल ,उदार और बोलते-से
शब्दों का रूप -रंग खिल कर
कुछ और निखर आयेगा !
*
मन की अरुचियों या कुण्ठा गिरावटें ,
शब्द पिचकारियों मे भर क्यों उलीचना !
शब्दों मे चिपके अणु बड़े संक्रामक हैं,
हवा के साथ -साथ दूर तक जायेंगे

अनुभव, जो पाये है
उगलो मत,पचने दो !
कच्चापन लपटों की आँचों में सिंकने दो,
रस बन कर बसने दो!
नये अनुभावों से अपने को रचने दो !
वाणी को तपने दो !

मानस की लहरों मे डूबें, गहराईयों मे
घुलें-धुलें ,स्वच्छ और
पार दर्शी शब्दों मे
जो भी कहोगे वो अनंत बन जायेगा !

मानस

यह चरित राम का, मानस कवि तुलसी का,
अनुभूति स्वयं ही व्यक्त हो उठे जैसे !
जो कह न सके, लेखनी लिख गई वह सब,
जीवन के मीठे- खट्टे अर्थ समेटे !

कवि को समझा तो इतना,जान सकी हूँ
रत्नावलि छिपी हुई सीता के पीछे ,
हो व्यकुल राम ,पूछते खग-मृग-तरु से,
मन भटका तुलसी बैठे आँखें मीचे !

तन नवल और सुन्दर सारी रत्ना की,
,मन की आँखों के आगे डोल रही है ,
सीता की पावन काया में वह छाया
कवि के भीतर के सच को खोल रही है !

कवि का अपना उर हुआ वेदना विह्वल,
उस विरह व्यथा से राम वनों में रोये !
वह स्वयं रहा निष्कासित जगजीवन से ,
तो राम अकेले कहाँ चैन से सोये !

जब आदि काल के करुणा सिक्त हृदय से
जो पीर पराई फूट पड़ी बन वाणी !
यह कथा राम की कहलाई इससे क्या ,
अपनी अपनी है सबकी राम-कहानी !

कुछ नहीं दिखाई दे ओझल रह जाये
घन- वाष्पों से छाया हो मन का दर्पण !
सब कुछ समेट सारी विचलन संयत कर,
अपनी ही राम-कहानी कर दी अर्पण !

रचना क्या? कवि का सच,रस रूप ग्रहण कर,
बन गयी कथ्य सारी अपनी ही बीती !
कहने-सुनने को फिर अवकाश कहाँ
अंतर की पीर छंद बन-बन कर फूटी !

आभास स्वयं मन को मन से हो जाता
जीवन कैसे बीता यह कौन बताये ,!
उस वीणा से हर मन के तार जुड़े हैं,
जो स्वर भर-भर कर उर तंत्री पर गाये !

कोई अपनी,कोई औरों की कहता ,
कोई औरों के मिस अपनी कह जाता ,
यह मेरी -तेरी नहीं अकेले जन की ,
पीड़ा से है प्रत्येक हृदय का नाता !

कैसी विरक्ति जो आत्मा में रति बनती ,
आसक्ति विरह में तप, साधना बने जब !
यों तो दिन-रात घटा करता कुछ जग में
कोई घटना बन जाती युग की करवट !

एक मिट्टी का खिलौना

एक मिट्टी का खिलौना जिन्दगी ,
ढालने को जन्म भी तैयार है ,खेलने को मौत भी तैयार !
*
चार साँसें ,एक आँसू ,एक स्मिति की लहर ,
एक आशा एख भाषा एक स्वर ,
और थोडी सी कसकती वेदना ,
और भरने के लिये छोटा प्रहर !
एक छोटी सी कहानी जिन्दगी ,
जोडने को जन्म भी तैयार है ,मोडने को मौत भी तैयार !
*
एक क्षण को आँख की पलकें झँपीं ,
स्वप्न बन कर ढल गये अनजान से
और क्या होगा इसी की याद को ,
कल्पना भरने लगी अनुमान से !
एक ऐसी है पहेली जिन्दगी ,
पूछने को जन्म भी तैयार है,पोंछने को मौत भी तैयार !
*
ढल रहा था काल के इस चक्र में ,
रूपरेखा किन्तु पहचानी लगी ,
मृत्तिका ने तन दिया ,यौवन दिया ,
अग्नि मे तप प्राण चेतनता जगी !
एक ऐसी रागिनी है जिन्दगी ,
छेडने को जन्म भी तैयार है ,छोडने को मौत भी तैयार !
*
और सदियाँ ढल गईँ बस इस तरह ,
हार जीवन ने कभी मानी नहीं ,
मिट्टियों से फिर नये अँकुर जगे ,मौत की यह एक मेहमानी रही !
एक ऐसी यात्रा है जिन्दगी ,
राह देने जन्म भी तैयार है ,छाँह देने मौत भी तैयार !
*

मै चेतन हूँ

मै चेतन हूँ , मुझको ये जडता के बंधन स्वीकार नहीं ,
उन्मुक्त पगों को मनचाहा चलने दो प्रिय,
मुझको इस उथले जग जीवन से प्यार नहीं !
*
ये निष्क्रिय चेतनता लेकर मैं इससे क्या निर्माण करूँ ,
इस बँधे हुये जग-जीवन में कैसे अपने उद्गार भरूँ ,
मैं मुक्त गगन की चल चपला ,बंधन स्वीकीर नहीं मुझको
पर नभ से भाग न जाऊँगी ,मेरा अनुपम संसार यहीं !
*
ये बँधी हुई वाणी ,बंधनमय गति ,ये बँधे हृदय ,
ये झरते से विश्वास और अंतर मे छिपे हुये संशय !
मेरा कल्पना लोक विस्तृत ,अधिकार नहीं सीमाओं का ,
पर चुभनेवाले स्वतंत्रता के ध्वंस मुझे स्वीकार नहीं !
*
ये बढती हुई पिपासायें ,ये मानव के गिरते से डग ,
विज्ञानो के निर्मम प्रयोग ,ये संस्कृतियों के पग डगमग ,
ये मूक उदास चरण ,,ये प्रतिक्षण बुझती जाती स्नेह-शिखा
ये दूर दूर ही रहें न करलें हम पर भी अधिकीर कहीं !
*

युग की आँखों ने देखा है वह प्रलय कि जो होनेवाला !
वह ध्वंस ,नहीं निर्माण ,आँधियों से पूरित ,भीषण ज्वाला !
उठ रही क्षितिज से ऊपर प्रलयंकरी ज्वाल ,
आलोक शिखा यह नहीं ,वसंती पुष्पों का शृंगार नहीं !
*
यह विषमय मंथन और सृष्टि मे बिछता जाता घोर गरल ,
अणु ज्वालाओं मे जल कर सुन्दर सृष्टि ,बचेगी क्षार अतल !
युग की आँखों फेरो न द-ष्टि ,जागो ,औ कवि के स्वर जागो ,
स्वीकार न करना वह करुणा जिस को मानव से प्यार नहीं !
*

देवता ,स्वीकारो ना स्वीकारो

देवता, स्वीकारो ना स्वीकारो !
ये तो तान मेरी गान तो तुम्हारे .
सौंप जाऊँ तुम्हें साँझ या सकारे ,
जी रहे हैं अनुरक्ति के सहारे ,
मेरे प्राण मे तुम्हारे राग सोये ,
आई द्वारे ,पुकारो ना पुकारो !
*
रह जाय चाहे जानी-अनजानी
मेरी साँस जो कहेगी वो कहानी
एक बात जो कभी न हो पुरानी ,
अश्रु वेदना को घोल के लिखेंगे,
आँख खोल के निहारो ,ना निहारो !
*
प्रात जाये,साँझ गाये रंग घोले,
मेरे प्राण मे विहंग एक बोले ,
दूर हेरते सितारे नैन खोले ,
ये तो भेंट में चढी हूँ मै स्वयं ही,
सिंगार तुम सँवारो ,ना सँवारो !
*
देर नहीं ,दूर नहीं बेला ,
लौट आया द्वार पाहुना अकेला ,
उठ रहा उलझनों का एक मेला ,
आँख मे अब नहीं रहे किनारे ,
सामने उबारो ,ना उबारो !
*
एक बेडी पहनाई शक्ति ने ही
अंत होगा एक अनुरक्ति मे ही ,
आज बाजी लगा दी भक्ति ने ही ,
मुक्ति मे नहीं ये कामना फलेगी ,
सोचना क्या ,तुम हारो ,ना हारो !

Monday, October 26, 2009

कहाँ की बात..

चलो बात आई गई हो गई !
छोड़ो शिकायत जो बो गई !
*
कहा-सुना तो ,क्या चिपक गया ,
फिर भी तो मन कुछ हिचक गया !
बोलो न ,चुप मत रहो, भई !
*
अच्छा ,चलो बाहर निकल चलें ,
कुछ कदम मिल कर पैदल चलें !
हँसें, ज़रा ! मिलते हैं लोग कई !
*
ज़िन्दगी है .ये सब तो चलता है ,
थोड़ा सा नमक-मिर्च मिलता है !
हुई नहीं कोई भी बात नई !
*
छत फाड़ ठहाका उठा था जब
एक दूसरे की तरफ़ देखा तब,
चार आँखें, लिये सवाल कई !
*
नज़रें थीं शर्ट के सिन्दूर पर ,खुले होंठ, दृष्टि झुकी झेंप कर १
बची-खुची बर्फ़ सब पिघल गई !
*

रिमोट-कंट्रोल

रिमोट-कंट्रोल
'अब तो तुम्हारा रिमोट कंट्रोल ठीक है,'
मैंने अपनी मित्र से पूछा !
'मेरी तो समझ में नहीं आता,
कैसे अपना लाइट पंखा
अपने आप दूसरे के इशारे पर चल जाता है !'
*
'बात इतनी है बहन,' मैंने समझाया,
'जब कनेक्शन कहीं और का रास आ जाये ,
या अनजाने ही वेवलेंग्थ
किसी और से मेल खा जाये
अंदर ही अंदर तरंग जुड़ जाती होगी ;
बिजली बिना तार के
दौड़ जाती होगी !'
'सचमुच !जब चौंक कर खुलती है नींद
देख कर उलट-फेर तुरत चेत जाती हूँ !
धीरज धर संयत हो
अपमे वाले को लाइन पे लाती हूँ !
खीज-जाती हूँ सम्हालती -सहेजती
कि सब ठीक-ठाक चले !'
'बड़ी मुश्किल है'सहानुभूति थी मेरी ,'होता है ऐसा
बेतार के तार बड़ा रहस्य है '
*
'अरे कोई एक बार
अनायास अनजाने अनचाहे
जब- तब यही !
बड़े बेमालूम तरीके से
अदृष्य सूत्र जुड़ जाता है !'
'नहीं, इस होने पर अपना कोई बस नहीं !'
परेशानी?
होती क्यों नहीं
पर अंततः
लाइन पर लाकर करती हूँ अपना रिमोट काबू!
वैसे भी अपना ही ठीक
हाथ में तो रहता है !'
मैंने भी चेताया ,
'हाँ
दूसरा कोई पता नहीं कब क्या करे
उस पर कोई अपना बस थोड़े ही है !'
*

Sunday, October 25, 2009

ओ चाँद जरा धीरे-धीरे नभ में उठना

ओ चाँद जरा धीरे-धीरे नभ में उठना
ओ चाँद जरा धीरे-धीरे
कोई शरमीली साध न बाकी रह जाये !
*
किरणों का जाल न फेंको अभी समय है ,
जो स्वप्न खिल रहे ,वे कुम्हला जायेंगे
ये जिनके प्रथम मिलन की मधु बेला है ,
हँस दोगे तो सचमुच शरमा जायेंगे !
प्रिय की अनन्त मनुहारों से
जो घूँघट अभी खुला है ,तुम झाँक न लेना
अभी प्रणय का पहला फूल खिला है !
स्वप्निल नयनों को अभी न आन जगाना ,
कानो में प्रिय की बात न आधी रह जाये !
*
पुण्यों के ठेकेदार अभी पहरा देते ,
ये क्योंकि रोशनी अभी उन्हें है अनचीन्हीं !
उनके पापों को ये अँधेर छिपा लेगा ,
जिनके नयनो मे भरी हुई है रंगीनी !
जीवन के कुछ भटके राही लेते होंगे ,
विश्राम कहीं तरुओं के नीचे छाया में ,
है अभी जागने की न यहाँ उनकी बारी ,
खो लेने दो कुछ और स्वप्न की माया में ,
झँप जाने दो चिर -तृषित विश्व की पलकों को ,
मानवता का यह पाप ढँका ही रह जाये !
*
जिनकी फूटी किस्मत में सुख की नींद नहीं ,
आँसू भीगी पलकों को लग जाने देना !
फिर तो काँटे कंकड़ उनके ही लिये बने ,
पर अभी और कुछ देर बहल जाने देना !
यौवन आतप से पहले जिन कंकालों पर
संध्या की गहरी मौन छाँह घिर आती है !
इस अँधियारे में उन्हें ढँका रह जाने दो ,
जिनके तन पर चिन्दी भी आज न बाकी है !
सडकों पर जो कौमार्य पडा है लावारिस ,
ऐसा न हो कि कुछ लाज न बाकी रह जाये !
*
ओ चाँद जरा धीरे-धीरे नभ में उठना ...!

Thursday, October 22, 2009

मुक्ति

*
कोई एहसान नहीं किया हमने तुम पर !
यह तो तुम्हारा अधिकार था और हमारा कर्तव्य !
पीढियों का ऋण चढा था जो हम पर ,
उतार, दिया तुमने सुख और आनन्द !
आभार तुम्हारा !
*
आत्मज मेरे ,
हमारा अस्तित्व व्याप्त रहेगा ,
जहाँ तक जायेगा तुम्हारा विस्तार !
तुम्हारा विकसता व्यक्तित्व सँवारने में,
चूक गये होंगे कितनी बार ,
आड़े आ गई होंगी हमारी सीमायें !
पर तुम्हारे लिये खुली हैं आ-क्षितिज दिशायें !
विस्तृत आकाश में उड़ान भरते
कोई द्विविधा मन में सिर न उठाये
कोई आशंका व्याप न जाये !
चलना है बहुत आगे तक ,
समर्थ हो तुम !
*
शान्त और प्रसन्न मन से
तुम्हें मुक्त कर देना चाहती हूँ अब
और स्वयं को भी -
हर बंधन से, भार से, अपेक्षा और अधिकार से,
कि निश्चिन्त और निर्द्वंद्व रहें हम !
जी सकें सहज जीवन, अपने अपने ढंग से !
क्योंकि प्यार बाँधता नहीं मुक्त करता है
और तुम्हें बहुत प्यार करती हूँ मैं !
*

पाथेय

*
समझौता कर आगे बढ़ लूँ, इस गुण से वंचित रही सदा
इसलिये विकर्षण बीच ,बढ़ चली अपने ही प्रतिमान लिये !
*
सौ-सौ धिक्कार मिले उठने को हुआ कि जब पहला ही पग
इतने काँटे चुभ गये ,हो गई अनायास विचलित डगमग !
आहत मन थोड़ा विरत हुआ आँखें थोड़ी हो गईँ तरल,
भीतर बैठे अंतर्वासी ने टोक दिया तत्क्षण ही जग !
आगे चल दी विश्वासों का अपना ध्रुवतारा साथ लिये !
*
हँसने के दिन थे जब धर दिये पलक के तल आँसू के घट,
कितनी वल्गाओं से कस कर रक्खा इस चंचल मन का रथ !
बाढों का वेग लिये आया उद्दाम प्रवाह बहा देने ,
जिस घाट शरण लेनी चाही घटवार लगाये बैठा पट !
इसलिये किसी को अपना कहने का साहस किस तरह करूँ
अब किस पर दोष धरूँ , अपने ही पल्ले धर संताप लिये!
*
इन थके पगों ने अब तो पार कर लियेकितने ग्राम नगर ,
कितनी घटनायें लिखी हुईँ ,पग-पग पर चलती हुई डगर
सबकी अपनी मंज़िल होगी फिर मिलना कैसा साँझ ढले
गठरी को खोल बाँट ने अब पथ के साथी कहाँ मिले
जो कुछ पाया पाथेय सहेजे लाई अपने साथ वही !
स्पृहा करूँ काहे की ,कुंठित सुख- अनुभूति स्वभाव लिये !
*
अब छोड़ो बंधु ,साँझ घिरती ,होने को ख़त्म कहानी है
यह नहीं आज की या कल की अंतर की पीर पुरानी है
कोई विकल्प ही नहीं रहा ,चुनने का मौका कहां मिला ,
भिक्षुक ने भला-बुरा जो भी पाया हो , दाता दानी है !
जब तक उधार निबटे तब तक व्यवहार -और व्यापार यहीं,
दायित्वहीन होकर कैसे भटकूँ मन में अवसाद लिये !
*

Wednesday, October 21, 2009

थम गई हैं विश्व की आँखें ,
यहीं इन्सानियत की क्षीण साँसें चल रही हैं !
प्रति निमिष के साथ युग पलकें उठाता
डोलता विश्वास आँखें जल रही हैं !
आज मानवता सिहरती ,
आज जीवन ले रहा निश्वास गहरी!
आज अंबर पूछता मैं किस प्रलय का मंच हूँ ,
यह शून्य की आँखें बनी हैं आज प्रहरी !

आज सिसकी भर रही संस्कृति
सृष्टि का उल्लास बेसुध सा पडा है !
स्वयं मानव के करों में प्रलय है ,
सृष्टा स्वयं विस्मित खडा है !
*
दीप धरा के बुझ जायेंगे ,
जलने की अंतिम सीमा के पार क्षार ही शेष बचेगी ,
विश्व-शान्ति का व्यंग्य रूप ,
मानवता की सामर्थों का उपहास उडाती !
और प्रकृति के हाथ उठायेंगे मानवता का शव !
नीर ढालता दैन्यभरा सृष्टा का वैभव !
कफन बनेगी क्षार और श्मशानभूमि होगी यह धरती !
*
उस अथाह नीलाभ गगन से बरसेंगे दो बूँद
कि ले कर कौन चले मानव की अर्थी !
मौन,शान्,निष्प्राण धरा पर तब ,जीवन के गान न होंगे !
धरती का वह रूप कि जिसमें
पतन और उत्थान न होंगे १
तारों का वह लोक धरा को विस्मित सा होकर ताकेगा !
मानवता के उस प्रयाण के बाद ,
निर्जन ,निर्जीवन ,भू-तल का वृत्त
शून्य चक्कर काटेगा !
*

तुमने केवल बाहर देखा !

तुमने केवल बाहर देखा ,काश हृदय में झाँका होता !
*
तुमने देखा मस्त हिलोंरों भरा सिन्धु का उमडा यौवन ,
कुमने देखा हिम किरीट से ढँकीहुई पर्वत की चोटी ,
पर बहार से भरे दिनों में बौरी आकुल अमराई से ,
तेरे अंतर से कोकिल की कूक कभी टकराई होती ,
तब अव्यक्त उस मधुता का तीखापन तुम अनुभव कर पाते ,
चाहे गहराई से तुमने उसा मोल न आँका होता !
*
जलते देखे दीप हजारों ,जिनसे कुहू बले उजियाली ,
देखी होगी ऊँचे-ऊँचे महलों में मनती दीवाली ,
झोपडियों की अँधियारी में शायद देक नहीं पाते हो
गहन अमाँ का कफन ओढ कर पडी जहाँ जीवन की लाली !
तुमने गिरती मानवता का देखा होता काश तमाशा ,
जिसकी साँसों का चलना भी किसी नयन का काँटा होता !
*
इतिहासों के पृष्ठ पलट कर ,देखा सम्राटों का वैभव ,
आँख मूँद कर हार जीत की बोली सुन ली होगी तुमने ,
पर देखो जन-जीवन को क्या आँख खोल कर देख सकोगे ,
कैसे अब इन्सान चल रहा अपने वर्तमान के पथ में !
अपनी न्याय तुला पर बीती सदियों को तो तोल चुके तुम ,
काश एक ही बार स्वयं के युग को भी कुछ जाँचा होता !
*
दुनिया की सडकों पर चलते तुमको शायद ये न पता हो ,
नैनों की गंगा -यमुना के तट पर कितने ताज अधूरे ,
काश ,जानते ,यहाँ मनुज का खून-पसीना भी बिक जाता ,
टुकडों की छीना-झपटी में ,जीने को भी दाम न पूरे !
काश जानते आज यहाँ ,मानवता बिकती ,लुटती ,पिटती
चाहे उसकी लूटमार तुमको भी एक तमाशा होता ! ,
*
तुमने देखा मस्त हिलोंरों भरा सिन्धु का उमडा यौवन ,
कुमने देखा हिम किरीट से ढँकीहुई पर्वत की चोटी ,
पर बहार से भरे दिनों में बौरी आकुल अमराई से ,
तेरे अंतर से कोकिल की कूक कभी टकराई होती ,
तब अव्यक्त उस मधुता का तीखापन तुम अनुभव कर पाते ,
चाहे गहराई से तुमने उसा मोल न आँका होता !
*
जलते देखे दीप हजारों ,जिनसे कुहू बने उजियाली ,
देखी होगी ऊँचे-ऊँचे महलों में मनती दीवाली ,
झोपडियों की अँधियारी में शायद देक नहीं पाते हो
गहन अमाँ का कफन ओढ कर पडी जहाँ जीवन की लाली !
तुमने गिरती मानवता का देखा होता काश तमाशा ,
जिसकी साँसों का चलना भी किसी नयन का काँटा होता !
*
इतिहासों के पृष्ठ पलट कर ,देखा सम्राटों का वैभव ,
आँख मूँद कर हार जीत की बोली सुन ली होगी तुमने ,
पर देखो जन-जीवन को क्या आँख खोल कर देख सकोगे ,
कैसे अब इन्सान चल रहा अपने वर्तमान के पथ में !
अपनी न्याय तुला पर बीती सदियों को तो तोल चुके तुम ,
काश एक ही बार स्वयं के युग को भी कुछ जाँचा होता !
*
दुनिया की सडकों पर चलते तुमको शायद ये न पता हो ,
नैनों की गंगा -यमुना के तट पर कितने ताज अधूरे ,
काश ,जानते ,यहाँ मनुज का खून-पसीना भी बिक जाता ,
टुकडों की छीना-झपटी में ,जीने को भी दाम न पूरे !
काश जानते आज यहाँ ,मानवता बिकती ,लुटती ,पिटती
चाहे उसकी लूटमार तुमको भी एक तमाशा होता !
तुमने केवल बाहर देखा ,काश हृदय में झाँका होता !
*

क्या कभी ऐसा न होगा !

कल्पनामय आज तो जीवन बना
पर जिन्दगीमय कल्पना हो क्या कभी ऐसा न होगा !
एक पग आगे बढा तो शूल पथ के मुसकराये,
एक क्षण पलगें खुलीं तो हो गये सपने पराये ,
एक ही मुस्कान ने सौ आँसुओं का नीर माँगा ,
एक ही पथ में समूचे विश्व के अभिशाप छाये !
स्वप्नमय ही हो गई हैं आज सारी चेतनायें ,
चेतनामय स्वप्न हों ये ,क्या कभी ऐसा न होगा !
एक बन्धन टूटने पर युग-युगों का व्यंग्य आया ,
एक दीपक के लिये तम का अपरिमित सिन्धु छाया ,
एक ही था चाँद नभ में किन्तु घटता ही रहा ,
जब तक न मावस का अँधेरा व्योम में घिर घोर आया !
इसलिये मैं खोजती हूँ चैन जीवन की व्यथा में ,
वेदना ही शान्ति वन जाये कभी ऐसा न होगा !
चाह से है राह कितनी दूर भी मैने न पूछा ,
क्या कभी मँझधार को भी कूल मिलता है न बूझा ,
किन्तु गति ही बन गई बंधन स्वयं चंचल पगों में ,
छाँह देने को किसी ने एक क्षण को भी न रोका !
ये भटकते ही रहे उद्ध्रान्त से मेरे चरण
पर भ्रान्ति में ही बन चले पथ क्या कभी ऐसा न होगा !
अब कभी बरसात रोती कभी मधुऋतु मुस्कराती ,
कभी झरती आग नभ से या सिहरती शीत आती ,
सोचती हूँ अनमनी मैं बस यही क्रम जिन्गी का ,
किन्तु मैं रुकने न पाती ,किन्तु मैं जाने न पाती १
आज खो देना स्वयं को चाहती विस्मृति-लहर में
भूल कर भी मैं स्नयं को पा सकूँ ऐसा न होगा !

Friday, October 16, 2009

चुनरी के दाग़

चुनरी के दाग़ -
अचानक लगा मैं हूँ ,
पर अपने से भिन्न !
सब कुछ घूमता हुआ
सारा बिगत, प्रत्यक्ष घटता हुआ !
शुरू से आखीर तक का सफ़र
त्वरित, गुज़र गया सामने से !
*
दर्शक मात्र रह गई अपनी ही यात्रा की !
देख लिया ,
लगे हैं दाग़ मेरी चुनरी में !
और निकट प्रस्थान की बेला !
*
क्षण-क्षण साक्षी मेरे,
जीवन भर रगड़-रगड़ माँजते रहे तुम,
नत-शिर ग्रहण करती रही,
तुम्हारा अवदान,
मन ही मन मनाते कि इतनी अशान्ति न व्याप जाये
जो आपा खो उभ्रान्त हो उठूँ,
बहक जाऊँ,बिखर जाऊँ अनजान दिशाओं में !
*
चूनर मेरी घिस गई ,
हो गई बेरंग जर्जर,
ताने-बाने रहे बिखर,
ऊपर से जमे हुये ये छींटे !
जो पीर औरों ने झेली मेरे कारण,
उड़-उड़ वही कण, मटमैला कर गये ,
ओढ़ कर आई थी जो स्वच्छ चूनर !
*
जाने-अनजाने जैसा भी,
किया तो मैंने ही !
शूल सा चुभ रहा अब !
नहीं, क्षमा नहीं,
कोई क्षमा नहीं !
कर लेने दो निवारण !
नहीं सहा जायेगा इतना बोझ ,
जन्म-जन्मान्तर झुका छोड़ जाये जो !
*
ओ रे ,घटवासी
धो लेने दो जाने से पहले ,
दे दो , अवसर परिमार्जन का !
नहीं तो कैसे करूँगी सामना !
कहाँ टिकूँगी तुम्हारी उज्ज्वलता के आगे !
*
कोरे अश्रुजल से नहीं धुलेंगे ये दाग़,
कर्मों का साबुन घिस-घिस ,
रगड़ने दो थोड़ा और !
थोड़ा और मँज लेने दो ,
हो लेने दो निर्मल !
*
यह ओढी हुई चूनर उतार,
रख जाऊँ यहीं !
कि जब सामना हो तुमसे ,
मेरे अंतर्यामी,
झेल सकूँ वह प्रखर तेज ,
सिर उठा कर देख सकूँ ,
वह स्नेहिल मुस्कान ,
और आत्मसात् कर सकूँ
दिव्यता का अमृत प्रसाद !

यात्रा

पुकार आ रही है !
आसार बन रहे हैं एक नई यात्रा के !
आहट सुन कसक उठी भीतर से ;
हर यात्रा की पूर्व संध्या होता है ऐसा !
सीमित आत्म से निकल
विराट् में प्रवेश करने का द्वार -
यात्रा !
*
तैयार हो लूँ !
जहाँ ,जिस तरह रही ,
घेरे से बाहर निकल आऊँ
सारा ताम-झाम छोड़ !

बिदा ,प्रिय स्मृतियों ,आशाओं-इच्छाओं ,संबंधों ,
स्वीकार लो प्रणाम मेरा ,
कि आगे निकल सकूँ,
निरी एकाकी ,निरुद्विग्न और निरपेक्ष !

कि नये दृष्य ,नये अनुभव,
मुक्त चेतना में समा सकें ,
कि एकदम अनाम अनुभूतियाँ
अजाने संवेदन ग्रहण करने को
मन के स्तर खुल जायें !
रह जाऊँ एकदम
खाली स्लेट,
कि होनेवाले अंकन सुस्पष्ट रहें !

Thursday, October 15, 2009

मैं तुम्हारा शंख हूँ !

ज्योति से करतल किरण सी अँगुलियों में
मैं तुम्हारी चेतना का उच्छलित कण ,
मैं तुम्हारा शंख हूँ !
*
परम काल प्रवाह का बाँधा गया क्षण
तुम्हीं से होता स्वरित मैं सृष्टि स्वन हूँ !
मैं तुम्हारी दिव्यता का सूक्ष्म कण हूँ !
महाकाशों में निनादित आदि स्वर का .
दस दिशाओं में प्रवर्तित गूँजता रव
हो प्रकंपित, दिशा के आवर्तनों के शून्य भर भर !
पंचभौतिक काय में निहितार्थ लेकर
मैं तुम्हारी अर्चना का लघु कलेवर!
*
फूँक दो वे कण कि हो जीवन्त मृणता
इस विनश्वर देह में वह गूँज भर दो ,
पंचतत्वों के विवर को शब्द दे कर
आत्म से परमात्म तक संयुक्त कर दो ,
सार्थकत्व प्रदान कर दो !
मैं तुम्हारा शंख हूँ ,
स्वर दे बजाओ !
*
उस परम चैतन्य पारावार की चिरमग्नता से,
किसी बहकी लहर ने झटका किनारे
और अब इस काल की उत्तप्त बालू में अकेला
आ पड़ा हूँ !
उठा लो कर में ,मुझे धो स्वच्छ कर दो !
भारती माँ , वेदिका पर स्थान दे दो !
फूंक भर भर कर बजाओ आरती में ,
जागरण के मंत्र में
अनुगूँज मेरी भी मिलाओ !
*
मैं तुम्हारी चेतना का उच्छलित कण ,
मैं तुम्हारा शंख हूँ
तुम फूँक भर-भऱ कर बजाओ !
मैं तुम्हार अंश हूँ ,
वह दिव्यता स्वर में जगाओ !
***

Sunday, October 11, 2009

ओ मेरे चिर-अंतर्यामी

कहीं शान्त तरु की छाया में बैठे होगे आसन मारे ,
मूँदे नैन ,शान्त औ'निश्चल ,गरल कंठ ,शशि माथे धारे ,
और जटाओं से झर-झऱ कर बहती हो गंगा की धारा,
मलय-पवन हिम-कण से युत हो करता हो अभिषेक तुम्हारा!
ऐसा रूप तुम्हारा पावन ,ओ मेरे चिर-अंतर्यामी ,
और यहाँ पर घुट-घुट कर मैं जीवन भरती रहूँ बिचारी !
कहाँ तुम्हारे पुण्य-चरण औ कहाँ जनम की भटकी हारी !
- प्रतिभा.

Saturday, October 10, 2009

तेरी मुक्ति !
मेरे स्वर तब तक न थमेंगे
,जब तक जीवन बीत न जाये
तेरी मुक्ति तभी है जिस दिन
मेरी वाणी गीत न गाये !
*
और नहीं तो बँधे रहो ,
मेरे स्वर के बंधन चंचल हैं !
बरबस मन में उतर चलेंगे ,
मेरे अंतर्गीत विकल हैं !
*
तुम नरहो तो शायद फिर ,
सारा संसार विजन बन जाये !
तुम न सुनो तो हृत्तंत्री की
तान न फिर शायद जग पाये
*
तुम न सुनो तो संभव है ,
मेरी वाणी फिर गीत न गाये !
तुम न लखो तो शायद यह अस्तित्व ,
जगत में ही घुल जाये !
*
चलती रहें उजाड़ हवायें ,
जीवन की आसायें बिखरा ,
छायेगी अनजान बने से
सपनों पर बेसुध सी तंद्रा !
*
अब के बाद न जाने कितने
दिन गुमसुम से ढल जायेंगे
जाने कितने आज सदा को ,
इसी तरह बन कल जायेंगे !
*
दृष्टि उठेगी महाशून्य में ,
सम्मुख कोई चित्र न होगा !
अब के बाद अकेलेपन का
शायद कोई मित्र न होगा !
*
दूर रहो तो एक मिलन की
चाह जगाते रहना प्रिय तुम ,!
मेरे स्वर की दुनियां में ,
मृदु राग जगाते रहना प्रिय तुम !
*
यों ही रहना -कहना है
जब तक ये साँसें रूठ न जायें
मुक्ति मिलेगी तुमको जिस दिन
मेरी वाणी गीत न गाये !
*

तेरी माटी चंदन !
तेरी माटी चंदन ,तेरा जल गंगा जल ,
तुझमें जो बहती है वह वायु प्राण का बल ,
ओ मातृ-भूमि, मेरे स्वीकार अमित वंदन !

*
मेरे आँसू पानी , मेरा ये तन माटी ,
जिनने तुझको गाया .बस वे स्वर अविनाशी !
मैं चाहे जहाँ रहूँ ,मन में तू हो हर दम !

*
नयनों में समा रहे .तेरे प्रभात संध्या ,
हर ओर तुझे देखे मन सावन का अंधा ,
तेरे आँचल में आ युग उड़ता जैसे क्षण !

*
तेरे आखऱ पढ़लूँ फिर और न कुछ सूझे
जो अधरों पर आये मन व्याकुल हो उमँगे,
लिखने में हाथ कँपे वह नाम बना सुमिरन!

*
तेरा रमणीय दरस धरती का स्वर्ग लगे
तेरी वाणी जैसे माँ के स्वर प्यार पगे,

अब तेरे परस बिना कितना तरसे तन-मन !
*
मेरी श्यामल धरती ,तुझसा न कहीं अपना ,
मैं अंतर में पाले उस गोदी का सपना ,
जिस माटी ने सिरजा ,उसमें ही मिले मरण !

*
मुझको समेट ले माँ ,लहराते आँचल में ,
कितना भटके जीवन इस बीहड़ जंगल में ,
अब मुझे क्षमा कर दे, मत दे यों निर्वासन !

*

Thursday, October 8, 2009

मेरे विश्वासों में उतरो

मेरे विश्वासों में उतरो

मेरे विश्वासों में उतरो ,ओ मेरे मन के अविनाशी
इस रूप जगत के आर-पार ,
हो रहे व्याप्त अनुभूति तार !
झंकृत हों जागें सातो स्वर
क्षिति से अंबर तक दें सँवार !
अक्षऱ अक्षर में निखर उठो तुम, इस क्षर तन के मधुमासी !
अविरल प्रवाह मय जल धारा
लहरें किरणों से आवर्तित
बिंबित ऊपर चल छायायें
गहरे मे निर्मल थिर अवथित !
क्रम धारा सरि सागर हो रे ,अंतर में रमते सन्यासी !

- प्रतिभा .
तीन बन्दर
आँख,कान और मुँह बंद किये,
बचते-भागते आ बैठे ड्राइँग रूम के अन्दर,
ये तीन बन्दर !
बैठे रहेंगे -
निश्चिन्त,आदर्श,परम अहिंसावादी,
यथार्थ से आँखें मूँदे ,महात्मा बने,
कि हम नहीं ऐसे
सारी दुनिया रहे चाहे जैसे !
बुराइयों से आँखें मूँद ,
एकदम चुप रहो,
बंद रखो कान ,
जो रहा है होने दो ,
हमें क्या ?
फैलती रहें अनीतियाँ ,अमर बेल की तरह
छल्ले फँसाती शाखा-प्रशाखाओं में बिना किसी अवरोध के !
सच के कँटीले रास्ते से भाग ,
यहाँ बैठे रहें ,अंध, मूक,बधिर बने,
गज़ब का संयम ओढ़े ,
सबसे तटस्थ,निर्लिप्त !
इस कमरे के अंदर ;
परम संत बने आत्ममुग्ध ,
ये तीन बंदर !
युग की महागाथा मे
लिखे होंगे सबसे ऊपर इनके नाम ,
हथियार छोड़ भागनेवालों में !
क्योंकि इस देश और इस काल में
सर्वग्रासी मि्थ्यादर्शों के बीच ,
परम संतोष से
जिये जा रहे हैं
आँख,कान और मुँह बंद कर ,
ये तीन बंदर !
(कुछ हल्का-फुल्का)
आदमी का दिमाग़ --
रेस्त्राँ मे गए, मँगाया मुर्ग ,मटन ,करी ,
शर्त यही थी कि स्वाद घर जैसा चाहिये !
घर मे जब होते हमेशा यही चाहते वे
ऐसा कुछ बनाइये रेस्त्राँ का स्वाद लाइये !
*
एक और बन्धु हैं जो अपनी घरवाली से
चाहते हैं चोंचले बाज़ारवाली की तरह ,
और बाहरवाली से चाह सिर्फ़ एक उन्हे
एक-निष्ठ बनी रहो घरवाली की तरह !
*
बच्चे थे तो चाहते थे हाय , क्यों न बड़े हुए ,
और अब बड़े हैं तो बच्चा बनना चाहते !
भारत मे रहते , अमेरिका के गुण गाते
अमरीका मे रहते तो भारत बखानते !
*
बेचारा विधाता सिर पकड़ के बैठ गया ,
मेरा किया कुछ भी इसे रास नहीं आता है !
काहे को दिमाग़ मैने दिया इस आदमी को ,
पाता है मुझी से और मुझी पे ग़ुर्राता है !
- प्रतिभा सक्सेना .

Monday, October 5, 2009

मेरी कवितायें

मछुआरा
मछुआरा फिर से जाल समेटेगा !
हो सावधान री, प्राणों की मछली ,
तू कितनी बार बची आई ,फिसली ,
हर बार नहीं बच पाता कोई भी ,
चुक जातीं सब भूलें पिछली-अगली !
बंसी में डोरी ,डोरी में काँटा ,
हर बार नया भर चारा , फेंकेगा !
मछुआरा फिर से जाल समेटेगा !

गहरा पानी ,हर जगह जाल फैले ,
क्या फँसी नहीं मछलियाँ कभी पहले ?
इस बार अगर बच भी निकली तो क्या ,
कुछ पल तल -सतहों को अपना कह ले !
खेले बिन उसको चैन कहाँ आये
साँसों की डोरी झटक लपेटेगा !
फिर से मछुआरा जाल समेटेगा !
- प्रतिभा सक्सेना