Sunday, April 25, 2010

अपना आँगन

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हम आज बिदाई कैसे दें ,क्या कहें तुम्हें ,मन में जो है वे बोल न मुख पर आते हैं ,
हैं शब्द बड़े लाचार आज ये समझ लिया उमड़े बादल बिन बरसे भी रह जाते है .
ओ,मीत ,ज़िन्दगी की ये राहें ऐसी हैं,कोई चाहे भी तो रुकता है कौन यहाँ ,
हम आज यहाँ जिस कोलाहल के बीच खड़े ,कल सूना होगा और चतुर्दिक् मौन यहाँ .
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हँस-खेल नजाने कितने दिन यों बीत गए इतने वर्षों का साथ अचानक आज छुटा ,
लो, आज बिदा की बेला सिर पर आ पहुँची ,जीवन की पटरी बदल रही दूसरी दिशा .
प्रिय साथी, हमने मंगल-दीप सजाए हैं,गुरु-जन ममता से भर असीसते हैं तुमको ,
पथ रखें उजेला उर की शुभाकांक्षाएँ ,तुम रहो प्रसन्न ,न व्यर्थ उदास करो मन को
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यह शिक्षालय जिसके आँगन में शीष झुका ,जीवन का सुन्दर सा अध्याय पढ़ा हमने ,
झर-झर झरते पीले कनेर की मंद गंध ,ये आम नीम के बौर सँजोए खड़े तने .
ये दिन जो बीत गए ,तुम याद करोगे ही ,कुछ दृष्य और परिवर्तित होते जाएँगे ,
पर देख तुम्हारी रिक्त जगह कुछ खटकेगा ,तुमको तो आगे और लोग मिल जाएंगे .
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आकाशों तक जाती ये विस्मय-मुग्ध दृष्टि ,सीढी-सीढी चढते ये चिर-गतिशील चरण ,
मुस्कान भरे अधरों के सुन्दर ,मधुर बोल ,खींचती तुम्हारा शब्द-चित्र अनुभूति गहन .
ये मिटनेवाले नहीं ,अमिट हैं यादों में ,हम सब को बीते दिन की याद दिलाएँगे .
तुम आगे बढते जाओ ,समय न लौटेगा ,पर स्मृतियों में ये फिर-फिरकर आ जाएँगे .
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तुमने जो स्नेह और अपनापन सींचा है ,वह याद रहेगा हमें तुम्हारा मधुर प्यार ,
तुम यहां रुके थे इसके चिर-आभारी हम,जा रहे आज उर पर आ बैठा एक भार ,
ओ मीत ,बहुत-कुछ है जो उमड़ रहा मन में पर कहने की भी कुछ अपनी सीमाएं हैं ,
इसलिए शेष रह जाने दो जो नहीं कहा ,जाने कितने स्वर रह जाते अनगाए हैं .
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ओ,पथ के साथी ,आगे बढ़ो ,और आगे ,सुन्दर भविष्य के स्वप्न बुलाते हैं तुमको ,
ये नेह भरे मन बिदा दे रहे तुम्हें आज ,ये दीप सदा आलोकित रक्खेंगे पथ को ,.
यों ही शिरीष के फूल कभी पथ में देखो ,या कभी अचानक हो जाए उन्मन-सा मन,
जब परिचयहीन नए-पथ में कुछ नया लगे तो तुम्हें याद आ जाए ये अपना आँगन !
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1 comment:

  1. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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