Monday, January 3, 2011

Woman &Childhood .(From old poems)

*
You can feel fragrance of smiles ,she is child ,

She is growing and glowing in hues so mild .

A candle in mist ,a bliss for sight .

Then makes a heaven of home ,her site .
*
And childhood jumps and clings to her lap.

In womanhood childhood there's no gap.

But time goes on ,she gains grey hair ,

This part of nature ,though ,not fair .
*
Great grand ma nature,never gets old ,

And this injustice never been told --

Great great grand ma ever fresh n 'green ,

And this grand mother never has been .
*
Comes childhood dancing around ,surrounds .

Her content pleasure ,knows no bounds .

She sings lull-a-by ,her grey hair dance

She looks not grown up ,as if in trance .
*
She holds the age old magic -wand ,

To take grandchildren to dream-land .

They grow up come in next stage ,

She takes long leap for infant age .

- Pratibha saksena

Sunday, December 26, 2010

भूत

*


भूत कभी मरता नहीं .

जितना भागोगे ,घेरेगा .

दौड़ना मत, भगाता चला जाएगा.

दूर ,और दूर !

तंत्र-मंत्र अभिचार , सब बेकार ,

अपना मौका तलाशता

हवाएँ सूँघ लेता है .

*

अकेली ,कुछ कमज़ोर ,

शिथिल-सी मनस्थिति देख

अनायास छाया सा घिर ,

तन-मन आविष्ट-अवसन्न कर

छोड़ देता है किसी अगाध में .

*

जितना भागोगे ,घेरेगा ,

भगाता चला जाएगा ,

विस्मृति भरी दूरियों तक.

और उसके लिए सच है -

जहाँ पलट कर देखो ,

पीछे लग जाएगा .

क्योंकि भूत कभी मरता नहीं .

*

Thursday, December 2, 2010

अनलिखा

अनलिखा वह पत्र मन ने पढ़ लिया होगा !

*
मुखर हो पाई न चाहे कामना तो थी ,
सत्य हो पाई न हो , संभावना तो थी ,
बहुत गहरे उतर अंतर थाह लेता जो
रह गई अभिव्यक्ति बिन पर भावना तो थी,
उड़ा डाला आँधियों ने और तो सब कुछ ,
किन्तु भारी-पन यथावत् धर दिया होगा
*
कुछ न मिटता, रूप बस थोड़ा बदल जाता ,
स्वरों ने गाया न हो पर गीत रच जाता.
अनबताया रह गया कुछ मौन में डूबा
रेतकण सा अँजुरी से रीत झर जाता .
रिक्तियों को पूरने की अवश मजबूरी
जो मिला स्वीकार नत-शिर कर लिया होगा !
*

Monday, November 1, 2010

जीवन-काँवर

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भौतिकता और चेतना के दो घटवाली जीवन-काँवर ,
लेकर आता है जीव ,श्वास की त्रिगुण डोर में अटका कर ,
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हर बार नये ही निर्धारण ,काँवरिये की यात्रा के पथ
चक्रिल राहों पर भरमाता देता फिर बरस-बरस भाँवर .
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घट में धारण कर लिया आस्था-विश्वासों का संचित जल
अर्पित कर महाकाल को फिर, चल देता अपने नियतस्थल !
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Thursday, October 7, 2010

जाने के बाद

मत रोओ शकुन्तला ,

मत रो बहिन .


वे निकल गए आगे

थोड़ी देर बाद चलेंगे हम .

*

जाना अकेले है ,

आए भी थे अकेले ,

इस बीच देखे कितने मेले ,

कुछ गुज़र गया .कुछ चल रहा है

बीत जाएगा यह भी.

न तुम दे सकोगी साथ मेरा

न मैं तुम्हारा

अगर चाहें भी तो

*

उनके साथ थीं तुम

मैने भी अनुभव किया था उन्हें ,

इस दूरी में शामिल की गई थी मैं ,

और मन ने मान लिया था साथ हूँ .

उनके जाने का खालीपन ,व्यापा है मुझे भी !

पर मैं नहीं रोई ,

वे कौन थे मेरे ,

बस अनुभव ही तो किया था यहाँ से

तुम भी मत रोओ ,शकुन्तला .

चलेंगे हम-तुम एक दिन !

जिसकी बारी जब आए .

*

मना रही हूँ -

वे शान्ति से रहें

जहाँ हों तुष्ट रहे !

हमारे लिए भी मनाएगा कोई ,

जाने के बाद .

चलना है शकुन्तला, हमें भी ,

रोओ मत बहिन ,

दुख मत करो जाने दो उन्हें

व्यथा ,और विवशताओँ से दूर

चिर- शान्ति में .

*

Sunday, September 26, 2010

श्यामला

*
ईषत् श्यामवर्णी,

उदित हुईं तुम

दिव्यता से ओत-प्रोत

अतीन्द्रिय विभा से दीप्त

मेरे आगे प्रत्यक्ष .

मैं ,अनिमिष-अभिभूत-

दृष्टि की स्निग्ध किरणों से

अभिमंत्रित, आविष्ट .

कानों में मृदु-स्वर-

'क्या माँगती है, बोल ?'

*

द्विधाकुल हो उठा मन -

पल-पल बदलती दुनिया और चलती फिरती इच्छाएँ

जो कल थी आज नहीं .

जो हूँ ,आगे नहीं .

काल- जल में बहता

निरंतर बनता-बिगड़ता प्रतिबिंब -मैं ,

क्या माँगूँ ?
*
क्या माँगूँ -

सुख ,यश ,धन बल .सब बीत जाएँगे ,

परछाइयाँ, जिन्हें समझना मुश्किल ,

पकड़ना असंभव

मन के घट और रीत जाएँगे

*

क्या माँगू ,इन सर्वसमर्थ्यमयी से ?

जैसे सम्राट् अबोध ग्राम्य बालक से

अचानक पूछे ,'बोल , क्या चाहिए '?

क्या बोलेगा विमूढ़ बेचारा ,

कहाँ तक विस्तारेगा लघुता अपनी!

क्या बोलूँ मैं?

*

स्निग्ध कान्ति में डूबा ,

इन्द्रियातीत हो उठा मन, मौन .

अनायास जागा अंतर - स्वर -

'जन्म-जन्मान्तर तक

मेरी आत्मा का कल्याण करों माँ ,

तुम्हीं जानो !'

*

करुणार्द्र नयन-कोरों से थाहतीं

तुम रुकी रहीं कुछ क्षण,

मंद स्मिति आनन पर झलकी ,

'तो, मैं चलती हूँ ,पुत्री.’

*

पुत्री ?

पुत्री कहा तुमने ?

मुझे?

क्या शेष रहा अब.,

कृतार्थ मैं !
*

'बस, आश्वस्त करती रहना,

 हर विचलन में , माँ ,

कि सिर पर हाथ तुम्हारा है!'

तुम अंतर्धान हो चुकीं थीं .

*

Friday, September 3, 2010

अदम्य-

*
धरती तल में उगी  घास
यों ही अनायास ,
पलती रही धरती के क्रोड़ में,
मटीले आँचल में .
हाथ-पाँव फैलाती आसपास .
मौसमी फूल नहीं हूँ
कि,यत्न से रोपी  जाऊँ ,पोसी जाऊँ!
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हर तरह से, रोकना चाहा ,.
कि हट जाऊँ मैं,
धरती माँ का आँचल पाट कर  ईंटों से
कि कहीं जगह न पाऊँ .
पर कौन रोक पाया मुझे?
जहाँ जगह मिली
सँधों में जमें माटी कणों से
फिर-फिर फूट आई.
*
सिर उठा चली आऊँगी ,
जहाँ तहाँ ,यहाँ -वहाँ ,
आहत भले होऊँ
हत नहीं होती ,
झेल कर आघात ,
जीना सीख लिया है ,
उपेक्षाओँ के बीच
अदम्य हूँ मैं !
*