*
You can feel fragrance of smiles ,she is child ,
She is growing and glowing in hues so mild .
A candle in mist ,a bliss for sight .
Then makes a heaven of home ,her site .
*
And childhood jumps and clings to her lap.
In womanhood childhood there's no gap.
But time goes on ,she gains grey hair ,
This part of nature ,though ,not fair .
*
Great grand ma nature,never gets old ,
And this injustice never been told --
Great great grand ma ever fresh n 'green ,
And this grand mother never has been .
*
Comes childhood dancing around ,surrounds .
Her content pleasure ,knows no bounds .
She sings lull-a-by ,her grey hair dance
She looks not grown up ,as if in trance .
*
She holds the age old magic -wand ,
To take grandchildren to dream-land .
They grow up come in next stage ,
She takes long leap for infant age .
- Pratibha saksena
Monday, January 3, 2011
Sunday, December 26, 2010
भूत
*
भूत कभी मरता नहीं .
जितना भागोगे ,घेरेगा .
दौड़ना मत, भगाता चला जाएगा.
दूर ,और दूर !
तंत्र-मंत्र अभिचार , सब बेकार ,
अपना मौका तलाशता
हवाएँ सूँघ लेता है .
*
अकेली ,कुछ कमज़ोर ,
शिथिल-सी मनस्थिति देख
अनायास छाया सा घिर ,
तन-मन आविष्ट-अवसन्न कर
छोड़ देता है किसी अगाध में .
*
जितना भागोगे ,घेरेगा ,
भगाता चला जाएगा ,
विस्मृति भरी दूरियों तक.
और उसके लिए सच है -
जहाँ पलट कर देखो ,
पीछे लग जाएगा .
क्योंकि भूत कभी मरता नहीं .
*
भूत कभी मरता नहीं .
जितना भागोगे ,घेरेगा .
दौड़ना मत, भगाता चला जाएगा.
दूर ,और दूर !
तंत्र-मंत्र अभिचार , सब बेकार ,
अपना मौका तलाशता
हवाएँ सूँघ लेता है .
*
अकेली ,कुछ कमज़ोर ,
शिथिल-सी मनस्थिति देख
अनायास छाया सा घिर ,
तन-मन आविष्ट-अवसन्न कर
छोड़ देता है किसी अगाध में .
*
जितना भागोगे ,घेरेगा ,
भगाता चला जाएगा ,
विस्मृति भरी दूरियों तक.
और उसके लिए सच है -
जहाँ पलट कर देखो ,
पीछे लग जाएगा .
क्योंकि भूत कभी मरता नहीं .
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Thursday, December 2, 2010
अनलिखा
अनलिखा वह पत्र मन ने पढ़ लिया होगा !
*
मुखर हो पाई न चाहे कामना तो थी ,
सत्य हो पाई न हो , संभावना तो थी ,
बहुत गहरे उतर अंतर थाह लेता जो
रह गई अभिव्यक्ति बिन पर भावना तो थी,
उड़ा डाला आँधियों ने और तो सब कुछ ,
किन्तु भारी-पन यथावत् धर दिया होगा
*
कुछ न मिटता, रूप बस थोड़ा बदल जाता ,
स्वरों ने गाया न हो पर गीत रच जाता.
अनबताया रह गया कुछ मौन में डूबा
रेतकण सा अँजुरी से रीत झर जाता .
रिक्तियों को पूरने की अवश मजबूरी
जो मिला स्वीकार नत-शिर कर लिया होगा !
*
*
मुखर हो पाई न चाहे कामना तो थी ,
सत्य हो पाई न हो , संभावना तो थी ,
बहुत गहरे उतर अंतर थाह लेता जो
रह गई अभिव्यक्ति बिन पर भावना तो थी,
उड़ा डाला आँधियों ने और तो सब कुछ ,
किन्तु भारी-पन यथावत् धर दिया होगा
*
कुछ न मिटता, रूप बस थोड़ा बदल जाता ,
स्वरों ने गाया न हो पर गीत रच जाता.
अनबताया रह गया कुछ मौन में डूबा
रेतकण सा अँजुरी से रीत झर जाता .
रिक्तियों को पूरने की अवश मजबूरी
जो मिला स्वीकार नत-शिर कर लिया होगा !
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Monday, November 1, 2010
जीवन-काँवर
*
भौतिकता और चेतना के दो घटवाली जीवन-काँवर ,
लेकर आता है जीव ,श्वास की त्रिगुण डोर में अटका कर ,
*
हर बार नये ही निर्धारण ,काँवरिये की यात्रा के पथ
चक्रिल राहों पर भरमाता देता फिर बरस-बरस भाँवर .
*
घट में धारण कर लिया आस्था-विश्वासों का संचित जल
अर्पित कर महाकाल को फिर, चल देता अपने नियतस्थल !
*
भौतिकता और चेतना के दो घटवाली जीवन-काँवर ,
लेकर आता है जीव ,श्वास की त्रिगुण डोर में अटका कर ,
*
हर बार नये ही निर्धारण ,काँवरिये की यात्रा के पथ
चक्रिल राहों पर भरमाता देता फिर बरस-बरस भाँवर .
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घट में धारण कर लिया आस्था-विश्वासों का संचित जल
अर्पित कर महाकाल को फिर, चल देता अपने नियतस्थल !
*
Thursday, October 7, 2010
जाने के बाद
मत रोओ शकुन्तला ,
मत रो बहिन .
वे निकल गए आगे
थोड़ी देर बाद चलेंगे हम .
*
जाना अकेले है ,
आए भी थे अकेले ,
इस बीच देखे कितने मेले ,
कुछ गुज़र गया .कुछ चल रहा है
बीत जाएगा यह भी.
न तुम दे सकोगी साथ मेरा
न मैं तुम्हारा
अगर चाहें भी तो
*
उनके साथ थीं तुम
मैने भी अनुभव किया था उन्हें ,
इस दूरी में शामिल की गई थी मैं ,
और मन ने मान लिया था साथ हूँ .
उनके जाने का खालीपन ,व्यापा है मुझे भी !
पर मैं नहीं रोई ,
वे कौन थे मेरे ,
बस अनुभव ही तो किया था यहाँ से
तुम भी मत रोओ ,शकुन्तला .
चलेंगे हम-तुम एक दिन !
जिसकी बारी जब आए .
*
मना रही हूँ -
वे शान्ति से रहें
जहाँ हों तुष्ट रहे !
हमारे लिए भी मनाएगा कोई ,
जाने के बाद .
चलना है शकुन्तला, हमें भी ,
रोओ मत बहिन ,
दुख मत करो जाने दो उन्हें
व्यथा ,और विवशताओँ से दूर
चिर- शान्ति में .
*
मत रो बहिन .
वे निकल गए आगे
थोड़ी देर बाद चलेंगे हम .
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जाना अकेले है ,
आए भी थे अकेले ,
इस बीच देखे कितने मेले ,
कुछ गुज़र गया .कुछ चल रहा है
बीत जाएगा यह भी.
न तुम दे सकोगी साथ मेरा
न मैं तुम्हारा
अगर चाहें भी तो
*
उनके साथ थीं तुम
मैने भी अनुभव किया था उन्हें ,
इस दूरी में शामिल की गई थी मैं ,
और मन ने मान लिया था साथ हूँ .
उनके जाने का खालीपन ,व्यापा है मुझे भी !
पर मैं नहीं रोई ,
वे कौन थे मेरे ,
बस अनुभव ही तो किया था यहाँ से
तुम भी मत रोओ ,शकुन्तला .
चलेंगे हम-तुम एक दिन !
जिसकी बारी जब आए .
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मना रही हूँ -
वे शान्ति से रहें
जहाँ हों तुष्ट रहे !
हमारे लिए भी मनाएगा कोई ,
जाने के बाद .
चलना है शकुन्तला, हमें भी ,
रोओ मत बहिन ,
दुख मत करो जाने दो उन्हें
व्यथा ,और विवशताओँ से दूर
चिर- शान्ति में .
*
Sunday, September 26, 2010
श्यामला
*
ईषत् श्यामवर्णी,
उदित हुईं तुम
दिव्यता से ओत-प्रोत
अतीन्द्रिय विभा से दीप्त
मेरे आगे प्रत्यक्ष .
मैं ,अनिमिष-अभिभूत-
दृष्टि की स्निग्ध किरणों से
अभिमंत्रित, आविष्ट .
कानों में मृदु-स्वर-
'क्या माँगती है, बोल ?'
*
द्विधाकुल हो उठा मन -
पल-पल बदलती दुनिया और चलती फिरती इच्छाएँ
जो कल थी आज नहीं .
जो हूँ ,आगे नहीं .
काल- जल में बहता
निरंतर बनता-बिगड़ता प्रतिबिंब -मैं ,
क्या माँगूँ ?
*
क्या माँगूँ -
सुख ,यश ,धन बल .सब बीत जाएँगे ,
परछाइयाँ, जिन्हें समझना मुश्किल ,
पकड़ना असंभव
मन के घट और रीत जाएँगे
*
क्या माँगू ,इन सर्वसमर्थ्यमयी से ?
जैसे सम्राट् अबोध ग्राम्य बालक से
अचानक पूछे ,'बोल , क्या चाहिए '?
क्या बोलेगा विमूढ़ बेचारा ,
कहाँ तक विस्तारेगा लघुता अपनी!
क्या बोलूँ मैं?
*
स्निग्ध कान्ति में डूबा ,
इन्द्रियातीत हो उठा मन, मौन .
अनायास जागा अंतर - स्वर -
'जन्म-जन्मान्तर तक
मेरी आत्मा का कल्याण करों माँ ,
तुम्हीं जानो !'
*
करुणार्द्र नयन-कोरों से थाहतीं
तुम रुकी रहीं कुछ क्षण,
मंद स्मिति आनन पर झलकी ,
'तो, मैं चलती हूँ ,पुत्री.’
*
पुत्री ?
पुत्री कहा तुमने ?
मुझे?
क्या शेष रहा अब.,
कृतार्थ मैं !
*
'बस, आश्वस्त करती रहना,
हर विचलन में , माँ ,
कि सिर पर हाथ तुम्हारा है!'
तुम अंतर्धान हो चुकीं थीं .
*
ईषत् श्यामवर्णी,
उदित हुईं तुम
दिव्यता से ओत-प्रोत
अतीन्द्रिय विभा से दीप्त
मेरे आगे प्रत्यक्ष .
मैं ,अनिमिष-अभिभूत-
दृष्टि की स्निग्ध किरणों से
अभिमंत्रित, आविष्ट .
कानों में मृदु-स्वर-
'क्या माँगती है, बोल ?'
*
द्विधाकुल हो उठा मन -
पल-पल बदलती दुनिया और चलती फिरती इच्छाएँ
जो कल थी आज नहीं .
जो हूँ ,आगे नहीं .
काल- जल में बहता
निरंतर बनता-बिगड़ता प्रतिबिंब -मैं ,
क्या माँगूँ ?
*
क्या माँगूँ -
सुख ,यश ,धन बल .सब बीत जाएँगे ,
परछाइयाँ, जिन्हें समझना मुश्किल ,
पकड़ना असंभव
मन के घट और रीत जाएँगे
*
क्या माँगू ,इन सर्वसमर्थ्यमयी से ?
जैसे सम्राट् अबोध ग्राम्य बालक से
अचानक पूछे ,'बोल , क्या चाहिए '?
क्या बोलेगा विमूढ़ बेचारा ,
कहाँ तक विस्तारेगा लघुता अपनी!
क्या बोलूँ मैं?
*
स्निग्ध कान्ति में डूबा ,
इन्द्रियातीत हो उठा मन, मौन .
अनायास जागा अंतर - स्वर -
'जन्म-जन्मान्तर तक
मेरी आत्मा का कल्याण करों माँ ,
तुम्हीं जानो !'
*
करुणार्द्र नयन-कोरों से थाहतीं
तुम रुकी रहीं कुछ क्षण,
मंद स्मिति आनन पर झलकी ,
'तो, मैं चलती हूँ ,पुत्री.’
*
पुत्री ?
पुत्री कहा तुमने ?
मुझे?
क्या शेष रहा अब.,
कृतार्थ मैं !
*
'बस, आश्वस्त करती रहना,
हर विचलन में , माँ ,
कि सिर पर हाथ तुम्हारा है!'
तुम अंतर्धान हो चुकीं थीं .
*
Friday, September 3, 2010
अदम्य-
*
धरती तल में उगी घास
यों ही अनायास ,
पलती रही धरती के क्रोड़ में,
मटीले आँचल में .
हाथ-पाँव फैलाती आसपास .
मौसमी फूल नहीं हूँ
कि,यत्न से रोपी जाऊँ ,पोसी जाऊँ!
*
हर तरह से, रोकना चाहा ,.
कि हट जाऊँ मैं,
धरती माँ का आँचल पाट कर ईंटों से
कि कहीं जगह न पाऊँ .
पर कौन रोक पाया मुझे?
जहाँ जगह मिली
सँधों में जमें माटी कणों से
फिर-फिर फूट आई.
*
सिर उठा चली आऊँगी ,
जहाँ तहाँ ,यहाँ -वहाँ ,
आहत भले होऊँ
हत नहीं होती ,
झेल कर आघात ,
जीना सीख लिया है ,
उपेक्षाओँ के बीच
अदम्य हूँ मैं !
धरती तल में उगी घास
यों ही अनायास ,
पलती रही धरती के क्रोड़ में,
मटीले आँचल में .
हाथ-पाँव फैलाती आसपास .
मौसमी फूल नहीं हूँ
कि,यत्न से रोपी जाऊँ ,पोसी जाऊँ!
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हर तरह से, रोकना चाहा ,.
कि हट जाऊँ मैं,
धरती माँ का आँचल पाट कर ईंटों से
कि कहीं जगह न पाऊँ .
पर कौन रोक पाया मुझे?
जहाँ जगह मिली
सँधों में जमें माटी कणों से
फिर-फिर फूट आई.
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सिर उठा चली आऊँगी ,
जहाँ तहाँ ,यहाँ -वहाँ ,
आहत भले होऊँ
हत नहीं होती ,
झेल कर आघात ,
जीना सीख लिया है ,
उपेक्षाओँ के बीच
अदम्य हूँ मैं !
*
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