Wednesday, August 18, 2010

मेरे देश उदास न होना . *

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कुछ पहचाने कुछ ,अनजाने दृष्य देख मन भरमा जाता,
एक पहेली पसरी लगती  ,अपना देश याद आता है !
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कहाँ  गए सारे टेसू- वन ,कैसे सूखी वे सरिताएँ १
 उजड़ा जीवन जीती होंगी साँसें, जैसे हों विधवाएँ
जिनका तन-मन-जीवन सींचा ,तूने किया नेह से पोषित
मेरे देश ,शप्त-सा तू अपनी ही संतानों से शोषित.
वहाँ पड़ रहा सूखा, मेरे नयनों में सावन-घन घहरे,
कोई संगति नहीं किन्तु कुछ रह रह कर घिर-घिर  आता है
*
कितना बदल गया जीवन-क्रम इस  पड़ाव तकआते आते !
कलम नहीं रुक पाती ,पर  कैसे ,लिख पाए सारी बातें ,
धरती की फसलों पर जैसे शाप छा गए हों अतृप्ति के
जल-धाराएँ हो मलीन उत्ताप जगा देतीं विरक्ति से
भरी भरी सरिताएँ ,घन वन नीले पर्वत देख यहाँ के
अपनी श्यामल धरती का स्नेहिल आवेग जाग जाता है ..
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उड़ जाते संतप्त हृदय के भाव ,अभाव शेष रहजाते
शब्द न मेरे बस में उठकर अनायास अंकित हो जाते
मेरे देश ,आँसुओं की बेरंग इबारत कौन पढ़ेगा ,
चकाचौंध के पीछे छाए अवसादों की कौन कहेगा
यहाँ वक्र रेखाओंवाले मकड़-जाल फैले पग-पग पर ,
मेरे मोहित मानस को वो ही परिवेश याद आता है !
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उस जल की बूंदें संचित हैं पके हुए जीवन के घट में
उस माटी की गंध सुरभि बन समा गई है नासापुट में
तेरे लिए कहे कोई कुछ, वह ध्वनि कानों से टकराती
साँसों में तेरे समीर की शीतल छुअन अभी है बाकी ,
बहुत पहाड़े पढ़ा चुकी पर फिर भी मन की रटन न टूटी
तेरी आँचल-छाया में अपना संसार याद आता है
*
अभी अमाँ के प्रहर न बीते ,दीप-वर्तिका पर काजल है ,
मेरे देश हताश न होना ,बीत रहा हर भारी पल है ,
मत उदास होना ,कोई संध्या फिर  नया चाँद लाएगी ,
सारा गगन गुँजाते तेरे वे सँदेश धरती गाएगी .
मेरी जननी , यह अनन्यता उन श्री-चरणों में स्वीकारो
तेरा नामोच्चार  प्राण में संजीवन छलका जाता है !


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Monday, August 9, 2010

संबंध

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डाल पर दो फूल खिलते साथ ही जो
टूटने के बाद उनके हो गए जब स्थान दो ,
जिनमें नहीं समता कहीं भी.
क्या परस्पर वहाँ
कुछ भी शेष रह जाती न ममता ,
सूख जाते स्नेह के सब स्रोत?
क्या सभी संबंध उनके
टूट जाते हैं इसी से?
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Thursday, July 29, 2010

मैं तुम्हारी भैरवी हूँ

उठो भैरव ,मैं तुम्हारी भैरवी हूँ !
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यह जगत जो कर्म का पर्याय होता ,
और जो कि प्रबुद्ध जीवन-मर्म का समवाय होता ,
रह गया बस कुमति की औ'दानवों की विकट लीला ,
औ त्रिशूली, भूधरों को कर विखंडित .
इस धरा की साँस को नव वायु देने
उतर आओ धरा पर मैं टेरती हूँ !
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ये बिके-से लोग ,कैसे साथ देंगे ?
अकर्मण्य कुतर्क ही हिस्से पड़ेंगे
यहाँ सबको सिर्फ़ अपनी ही पड़ी है .
पशु नितान्त मदान्ध सारे खूँदते धरती रहेंगे
चले आओ तुम प्रलय का नाद भरते ,
कंठ हित नर-मुंडमाल लिए खड़ी हूँ !
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अरे विषपायी, उगल दो कंठ का विष ,
भस्म हो जाएं सभी कल्मष यहाँ के ,
गंग की धारा जटाओं में समा लो ,
भेज दो दिवलोक में फिर सिर चढ़ा के
घूमता गोला धरा का जिस धुरी पर
अंतरिक्षों में घुमाकर फेंक डालो !
रच दिया परिशिष्ट ,उपसंहार कर दो ,
चलो रुद्र कराल बन तुम काल, मैं प्रलयंकरी हूँ .
*
आज आँसू नहीं बस अंगार मुझ में
एक भीषण युद्ध की टंकार स्वर में
नहीं संभव जहाँ सहज सरल स्वभाव जीना
जब कृतघ्नों की हुई हो चरम सीमा
व्यर्थ हों वरदान कुत्सा से विदूषित
वार उन का ही उन्हें कर जाय भस्मित
रक्तबीजों के लिए विस्तार जिह्वा मैं खड़ी हूँ !
उठो भैरव ,मैं तुम्हारी भैरवी हूँ !
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Friday, July 16, 2010

समग्र शान्ति के लिए

समग्र शान्ति के लिए हिमालया पुकारता !
कि जीव मात्र के लिए धरा कुटुम्ब ही रहे ,
वनों,समुद्र पर्वतों में शंख-ध्वनि गुँजारता .
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अलग न भूमि खंड ये ,अखंड है वसुन्धरा ,
हृदय विशाल हो मिलन समान मित्र-भाव का ,
न स्वार्थ साधना ,न हो प्रवंचना ,विडंबना ,
मिलो तो प्यार से मिलो ,समुद्र मार्ग दे रहा !
नई सदी मनुष्यता के पाठ बाँचती रहे ,
नवीन युग प्रवेश-द्वार में खड़ा निहारता !
*
ये वोल्गा .ये हाँगहो .फ़रात ,नील ,ज़ेम्बसी ,
धरा को बाँह में भरे ये ऊष्ण-शीत बंध भी,
गगन,समीर,जल.अनल ,सुदूर अंतरिक्ष तक ,
अखंड शान्ति व्याप्त हो विकास पथ सँवारती !
सिहर रही अमेरिका के राकियों की शृंखला
अमेज़नी तटों का अंधकार दीप्ति माँगता !
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ज़हर न खेत में उगे ,पुकारता है दारुवन,
उदास हर कली हुई ,चले न बारुदी पवन .
कि रंग-भेद ,नस्ल-धेद,पंथ-भेद अब न हों ,
मदान्ध द्वेष भस्म कर न दे कहीं सभी सपन
धुआँ-धुआं हुआ पवन गुबार हिमित द्वीप के,
सुदूर पूर्व में खड़ा हुआ फ़ुज़ी फुँकारता!
*
कि गंग सिंधु,ब्रह्मपुत्र,नर्मदा पुकारती ,
पुकारता है शोण नद ,कि टेरती महानदी ,
अमोघ शान्ति-मंत्र--पाठ सृष्टि को सुना रही
समुद्र संधि पर अड़ी खड़ी प्रबुद्ध भारती
समृद्ध ऋद्धि-सिद्धि से धरा बने मनोरमा,
मनुष्य की मनुष्य से बनी रहे समानता !
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Wednesday, June 30, 2010

प्रथम छंद

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वह प्रथम छंद,
बह चला उमड़ कर अनायास सब तोड़ बंध,
ऋषि के स्वर में वह वह लोक-जगत का आदि छंद !
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जब तपोथली में जन-जीवन से उदासीन,
करुणाकुल वाणी अनायास हो उठी मुखर
क्रौंची की दारुण -व्यथा द्रवित आकुल कवि-मन
की संवेदना अनादि-स्वरों में गई बिखर .
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अंतर में कैसी पीर ,अशान्ति और विचलन
ऐसे ही विषम पलों में कोई सम्मोहन
स्वर भरता मुखरित कर जाता अंतर -विषाद
मूर्तित करुणा का निस्स्वर असह अरण्य रुदन ,
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तब देवावाहन - सूक्त स्तुतियाँ सब बिसार
कवि संबोधित कर उठा,' अरे ,ओ ,रे निषाद..'
स्वर प्राणि-मात्र की विकल वेदना के साक्षी
शास्त्रीय विधानों रीति-नीति से विगत-राग.
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जैसे गिरि वर से अनायास फूटे निर्झर
उस आदि कथ्य से सिंचित हुआ जगत-कानन,
कंपन भर गया पवन में जल में हो अधीर ,
तमसा के ओर-छोर ,गिरि वन ,तट के आश्रम !

खोया निजत्व उस विषम वेदना के पल में
तब प्राणिमात्र से जुड़े झनझना हृदय- तार
उस स्वर्णिम पल में ,बंध तोड़ आवरण छोड़
ऊर्जित स्वर भर सरसी कविता की अमिय-धार .,,
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Monday, June 14, 2010

किरातिन

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किस किरातिन ने लगा दी आग ,
धू-धू जल उठा वन !
रवि किरण जिसका सरस तल छू न पाई
युगों तक पोषित धरित्री ने किया जिनको लगन से !
पार करते उन सघन हरियालियों को
प्रखर सूरज किरण अपनी तीव्रता खो ,
हो उठे मृदु श्याम वर्णी ,

ओढे है अँगारे !
जल रही है घास-दूर्वायें कि जिनको
तुहिन कण ले सींचते संध्या सकारे ,
भस्म हो हो कर हवाओं में समाये !
जल गये हैं तितलियों के पंख ,
चक्कर काटते भयभीत, खग,
उन बिरछ डालों पर सजा था नीड़,करते रोर
गिरते देखते नव शावकों की देह जलते घोंसलों से !

और सर्पिल धूम लहराता गगन तक !
वृक्ष से छुट-छुट गिरीं चट्-चट् लतायें ,
धूम के पर्वत उठे ,
लपटें लपेटे ,शाख तरु की ,फूल ,फल पत्ते निगलती !
भुन रहे जीवित, विकल चीत्कार करते जीव ,-
जायेंगे कहाँ, वे इस लपट से उस लपट तक !
यहाँ तो इस ओर से उस ओर तक नर्तित शिखायें वह्नि की
लपलप अरुण जिहृवा पसारे ,कर रहीं पीछा निरंतर !

किलकिलाती है किरातिन ,
जल रहा वन खिलखिलाती है
किरातिन !
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Tuesday, May 11, 2010

जन्म

*
यवनिकाओं खिंचे रहस्यलोक में
ढल रहीं अजानी आकृति
की निरंतर उठा-पटक ,
जीवन खींचता
विकसता अंकुर
कितनी भूमिकाओं का निर्वाह एक साथ
नए जन्म की पूर्व-पीठिका .
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कितने विषम होते हैं
जन्म के क्षण
रक्त और स्वेद की कीच
दुसह वेदना ,
धरती फोड़ बाहर आने को आकुल अंकुर
और फूटने की पीड़ा से व्याकुल धरती !
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पीड़ा की नीली लहरें
झटके दे दे कर मरोड़ती ,
तीक्ष्ण नखों से खरोंच डालती हैं तन
बार-बार प्राणों को खींचती -सी !
फूँकने में नए प्राण ,
मृत्यु को भोगती
जननी की श्वासें श्लथ ,
लथपथ .
*
देख कर आँचल का फूल
सारी पीड़ाएँ भूल
नेह-पगी अमिय-धार से सींचती,
सहज प्रसन्न .परिपूर्ण ,आत्म-तुष्ट
जैसे कोई साखी या ऋचा
प्रकृति के छंद में जाग उठे !
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