Monday, December 28, 2009

सारा आकाश

*
बस पंख सलामत रहें
सारा आकाश तुम्हारा
कोई घेरा .
काफ़ी नहीं तुम्हारे लिये
न सीमित करती कोई कारा .
पंख जहाँ ले जायँ ,
वहीं पर लिखा दे नाम तुम्हारा .
नाम जो मेरे स्व का विस्तार
दिया तुम्हें मेरी अस्मिता ने
जहाँ तक तुम्हारी पहुँच ,
व्यप्ति है मेरी !
समर्थ रहें पंख ,
स्वतंत्र ,सचेत ,निर्बाध !
और सारा आकाश तुम्हारा .

Wednesday, December 23, 2009

जाते बरस प्रणाम

*
महाकाल की एक सांस तुम ,
एक चक्र बीता !
क्या दे सके तुम्हें हम ,
इसका कौन करे लेखा ?
इतने काल खंड का जो कुछ ,
देव , तुम्हारे नाम !
*
शेष रहा जो क्षमा करो ,
दे आशिष चलती बार .
जो तुमने दी छाँह ,
उसी का स्वीकारो आभार !
आशा -आकाँक्षायें ले
तुम आये गठरी बाँध .
जितना पात्र हमारा था .
तुम डाल चले निष्काम .
चलते बरस ,प्रणाम !
-प्रतिभा.

Monday, December 21, 2009

आते ही क्यों

स्वीकारकिया होता तो हम आते ही क्यों ?
इस भाँति पराये देश ढूँढने को साधन
अधिकार मिला होता तो बिलगाते ही क्यों!
*
सीढी बनना स्वीकार नहीं कर पाये हम,
सिर चढे रहे हम पर जो थे सुवधाभोगी !
सपने साकार कर सकें संभव हो न सका
जोगडा बना रह जाता यह घरका जोगी ,
सागर के तट पर एक रेत का कण भर थे
नभ गंगा का तारा बनने को निकल पडे !
सामर्थ्य सिद्ध कर देने का अवसर मिलता
मानवगरिमा से पूर्ण सहज जीवन मिलता ,
इस चकाचौंध के बीच डूबने आते क्यों !
*
बेबसी यही थी बाधायें हो गईं नियति,
जब भी आगे बढने को कोई कदम उठा ,
रोडे अटके ,अवरोधों ने बढ रोकी गति
सारे उत्साहों पर पानी न फिरा होता
अवसाद निराशा से बचने का पथ मिलता
आगे बढने के लये पाँव आकुल थे जो ,
थोडी भी सुविधा नहीं विषम सी द्विविधायें ,
अपने शैशव,अपने यौवन की गाँव-गली,
अपनी माटी को छोड विदेश बसाते क्यों
*
कितनी रुकावटें ,रोडे औ व्यवधान द्वेष
कुछ करने की थी बडी तमन्नायें मन में,
कोई भी सच को सुननेवाला मिला नहीं
अवसर पाया हम खाली हाथ चले आये
अपनी मिट्टी का मोह खींचता बार बार ,
ऊँची ऊँची बातें केवल कहने भर की ,
जाना समझा तो फिर हम नहीं बहल पाये
समझौतोंसे हर पल उद्वेलित हृदय लिये
इन आकाशों में पंख खोलने आते क्यों
*
ईमान बिका है भ्रष्टों के बाजारों में,
निष्ठायें लोटीं कूटनीति के चरण तले
ऊँचे पव्वों के दाँव जीतते हर अवसर ,
हर जगह ढोल में पोल,करे किसकी प्रतीति
अपने हित हेतु बदल जाते हैं मानदंड ,
संस्कारहीनता की संस्कृति पनपी ऐसी
नेता हैं भाँड छिछोर, भँडैती राज-नीति ,
निर्लज्ज कुपढ़ निर्धारित करते रीति नीति ,
उनकी लाठी हाँके ले जाती शासन को
जनता जनार्दन उदासीन ,जो हो सो हो
मान्यता बुद्धि को मिलती लाठी से ऊपर ,
तो फिर बाहरवालों के काज सुहाते क्यों !
*
'वसुधा कुटुंब' का पाठ हृदय में धार लिया,
अपनी धरती का ऋण हमने स्वीकार लिया
अवसर प्रयास को मिला दक्षिणा देने का ,
सौभाग्य समझ आगे बढ़ हाथों हाथ लिया
अपनी संस्कृति के पहरेदार यहाँ है हम
मन से अपन स्वजनों से दूर कहां हैं हम
कुछ समझे कुछ कर सके अन्यथा सचमुच हम
इन अनजाने आकाशों पर छा जाते क्यों
*

Friday, December 11, 2009

दो सांसें क्या दे दीं

दो साँसें क्या दे दीं ,तन बिक गया गुलामी में ,
आभारों का भार ,जाल हर ओर बिछा डाला !
किसने माँगा था ,तुम जीने का बंधन दे दो ,
किसने हाथ पसारा था ,दारुण मंथन दे दो !
काहे को दे दिया कठिन एहसानों का बोझा ,
कौन माँगने गया कि तुम इतना क्रन्दन दे दो !
दो साँसें क्या दे दीं कुछ भी शेष नहीं छोडा ,
सभी कामनाओं को पहरे में यों कर डाला !
आज पहाड हो गया ऋण जो लगता था राी ,
लिया किन्तु चढ गई वसूली में पाईपाई !
ऐसा निर्मम मिला महाजन सबकुछ ले कर भी ,
कहता पूरी नहीं हुई अब तक भी भर पाई !
बार बार वंचित करने की धमकी दे दे कर ,
मेरे मन को भी इतना कमजोर बना डाला !
अब तो आगे और कामना कोई शेष, नहीं ,
दर्पण में दिखता जो लगता अपना वेश नहीं !
इतनी गैर हो गई हूँ अपने ही से अब तो ,
तुम न दिखो तो लगता अपना कोई देश नहीं !
आँसू के बदले दे डालीं स्वर की मालायें ,
इतना बोझ दिया तुमने यों बेबस कर डाला !

Friday, November 27, 2009

अग्नि-संभवा

कृष्ण,मेरे मीत
अग्नि संभव द्रौपदी मैं
खड़ी अविचल जल रही अनुताप में
उद्दीप्त पल-पल क्षुब्ध और अशान्त
तुम तपन झेलो ,न कोई और
तुम शरण मेरी, न कोई और
*
दौड़ आते तुम्हीं बारंबार
इस निर्वास- वन में
छोड़ अपना राजसुख- रनिवास ,
धीर देने बाँटने को भार मन का
प्रिय सखी के साथ !
तुम परम आत्मीय ,
मेरा हो न कोई और .
टेरता मन कह रहा
तुमसे मिले युग हो गये
ओ ,मीत मेरे !
तुम शऱण मेरी
न कोई और .
*
बंधु प्रिय मेरे ,
सभी का एक माध्यम मै.
स्वत्व मेरा कुछ नहीं .
मैं बँटी हूँ ,जुड़ूँ किससे
अधूरी हूँ मैं सभी के साथ ,
मन से रहूं किसके पास .
पति परस्पर बँधे बेबस,
एक असमंजस कि
मैं हूँ डोर.
कौन है,जो समझ ले मेरी व्यथा को ?
एक केवल तुम,
न कोई और .
तुम शऱण मेरी, न कोई और .
*
मीत
हर सामर्थ्य मेरी,बन गई उपभोग .
दाँव पर मैं ,
और कब से चल रहा यह खेल .
वे परम गंभीर,मृदु संयत .
मुखर मैं ,कटु ,असहनशील
सब स्वीकार .
किन्तु यह निर्लज्ज अत्याचार ?
और वह क्षण दुसह दारुण भयावह,
वह बीतता ही नहीं
बनता एक हाहाकार .
हो रहा अपमान औ' उपहास
पर वे सिर झुकाये साक्षी चुपचाप
मिथ्यादर्श की ले आड़.
उस सामर्थ्य को धिक्कार .
नीति धर्म,विवेक सब बेकार,
किसे अब तक सके कभी उबार?
सभी को रख दो ,सुरक्षित कर पिटारी बंद
खा जाये न चोट उनका धर्म पा कर वार!
इस विडंबन का कहाँ है पार ?
सिर्फ़ तुमने ही उबारा ,
तुम चुभन झेलो, न कोई और .
तुम शऱण मेरी, न कोई और.
*
और तुम?
जो सर्वथा ही भिन्न ,
जीवन-सहजता के मंत्र .
कौन से तुमने नियम या नीति मानी?
तोड़ सारी वर्जनायें,
एक तुमने ही
स्वयं को साक्षी कर,
मानवी गरिमा न हो खंडित यहाँ ,
सब रीति मर्यादा बदल दी .
और जीवन भर तुम्हीं ने
व्यर्थ के प्रतिबंध तोड़े,
छलों के अनुबंध तोड़े,
सहज हो कर बहे युग-धारा
कि आरोपित सभी पाखंड तोड़े .
एक ही संबंध तुमसे
बस नहीं कुछ और
तुम शऱण मेरी, न कोई और.
*
विगत और भविष्य तुम निर्बाध
विषम ,अँधे क्षणों में लो साध.
सांत्वना के कुछ सहज उद्गार
जब निराशा हो चरम तब तुम खड़े हो साथ!
मीत मेरे,
बस यही विश्वास
नहीं दैहिक कामना कोई हमारे बीच, और कुछ भी नहीं
जो कुछ और .
तुम शऱण मेरी, न कोई और
*
शब्द सीमित ,
अर्थ का विस्तार
तुम तक पहुँच जायेगा .
अजानी दूरियों को लाँघ,
मेरा मौन भी कह बहुत जायेगा .
यही दृढ़ संबंध जो जोड़े हुये है .
और कुछ भी नहीं
अपने बीच .
तुम्हीं से उन्मुख न कोई और
तुम शरण मेरी, न कोई और
*
शब्द औ'संवेदना ही,
और निष्कृति भी तुम्हीं से.
बसनहीं कुछ और .
तुम परम आत्मीय,सतत समीप ,
तुम तपन झेलो,न कोई और.
तुम शरण मेरी, न कोई और !

Sunday, November 15, 2009

अधूरी तपस्या तुम्हें माँगती है !

शपथ है तुम्हें इस विरागी हृदय की
अधूरी तपस्या तुम्हें माँगती है !
*
न जीवन रहेगा ,न आँसू बचेंगे ,
न पिर-फिर यही राग चलते रहेंगे ,
न मिट्टी इसी रूप में रह सकेगी ,
सदा ही न ये प्राण बहले रहेंगे !
*
मिटी आश ,चिन्ता न इसकी मुझे ,
पर न मिट पा सकेंगी अभी साधनाये ,
ढलेगा दिवस और रजनी ढलेगी ,
चलेंगी अभी मौन आराधनाये !
*
स्वयं ही तुम्हें पास आना पड़ेगा
कि ये जल रही प्राण सी आरती है !
*
अभी वेदना श्वास को बाँधती ,
पर रहेगा सदा ही न अस्तित्व मेरा ,
जनम-मौत खींचे लिये चल रहेंहैं ,
मिलोगा कहीं तो मुझे ठौर मेरा !
*
अरे, पत्थरों से भले तुम रहो ,
पर कभी आवरण यह हटाना पड़ेगा ,
कभी मृत्तिका में खिलेंगे सुमन वह,
कि जिनको तुम्हें सिर चढ़ाना पड़ेगा !
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अरे देवता ,तुम न पत्थर रहोगे
कि जब तक यहां भावना जागती है !
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Thursday, November 12, 2009

आये न अब लौं कहार

आये न अब लौं कहार, हमार डुलिया कइस उठिबे !
माथे पे बिंदिया, नयन भरो कजरा
रुच के सजाय देओ फूलन के गजरा
टटकी चटक लाल चूनर उढ़ावो ,
केहि दिसि पी घर मारग दिखावो
गैलो न मालुम पहुँचिबे कइस,
हिया लागि चिन्ता हमार !
पिया घर कइस जइबे !
सुध न रहे कजरा ,न गजरा ,न चुरियाँ ,
रख जाई हियनै ई पहिरी चुनरिया !
डोली भी अइबे ,कहार दौरि अइहैं ,
काहे तू हैरान , पिया संगै लइ जइहैं !
सारी विवस्था ,खुदै होइ जाई ,
आवहिंगे जब वे दुआर !
सबै देखित रहि जइबे !